कवर्धा

जिला मुंगेली,,,,मुंगेली में भव्य एवं गरिमामय जिला स्तरीय संस्कृत संगोष्ठी संपन्नउपशीर्षक: संस्कृत भाषा के संरक्षण, संवर्धन और विद्यालयी शिक्षा में प्रभावी क्रियान्वयन पर हुआ व्यापक विचार-विमर्श; संस्कृत व्याख्याताओं को मिला विद्वानों का मार्गदर्शन

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मुंगेली/ ​जिला मुख्यालय मुंगेली में आज संस्कृत भाषा के गौरवशाली इतिहास, समृद्ध साहित्यिक परंपरा, भारतीय ज्ञान-विज्ञान एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा विद्यालयी शिक्षा में इसके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर संस्कृत व्याख्याताओं की एक भव्य एवं गरिमामय जिला स्तरीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस महत्वपूर्ण शैक्षणिक आयोजन में आध्यात्मिक संतों, संस्कृत के विद्वानों, छत्तीसगढ़ संस्कृत विद्यामण्डल के प्रतिनिधियों, जिला शिक्षा विभाग के अधिकारियों और जिले भर के संस्कृत व्याख्याताओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
​अतिथियों का पावन सान्निध्य और गरिमामयी उपस्थिति
कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती की वंदना और वैदिक मंगलाचरण के साथ हुआ। संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में परमपूज्य श्रीचक्र महामेरु पीठाधिपतिः, अनन्तश्री विभूषितः परमपूज्य गुरुदेव श्रीश्री सच्चिदानन्द तीर्थ महास्वामी जी महाराज का पावन सान्निध्य प्राप्त हुआ। वहीं, विशिष्ट अतिथि के रूप में छत्तीसगढ़ संस्कृत विद्यामण्डल, रायपुर के माननीय अध्यक्ष श्री राजेश कुमार राजपूत की गरिमामयी उपस्थिति रही।
​जिला शिक्षा विभाग की ओर से जिला शिक्षा अधिकारी डॉ. मोहन लाल पटेल एवं डी.एम.सी. श्री अशोक सोनी के मार्गदर्शन में ए.पी.सी. श्री तीरथ प्रसाद बड़गैयाँ, श्री लेखराम साहू एवं श्री प्रदीप उपाध्याय विशेष रूप से उपस्थित रहे। इसके अलावा, पीएम श्री स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालय दाऊपारा के एस.एम.सी. अध्यक्ष अरविन्द सिंह राजपूत, प्राचार्या श्रीमती लीला श्रीवास्तव तथा स्थानीय जनप्रतिनिधि श्री नर्मदा सिंह राजपूत, श्री पीतांबर सिंह ठाकुर, श्री विनोद सिंह राजपूत एवं श्री अखिलेश्वर राजपूत कार्यक्रम में शामिल हुए। कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन संस्कृत व्याख्याता डॉ. रामबाबू मिश्र द्वारा किया गया।
​संस्कृत: भारतीय ज्ञान परंपरा और जीवन मूल्यों की आधारशिला
संगोष्ठी के दौरान वक्ताओं ने संस्कृत भाषा की सार्वकालिक प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, पुराण, दर्शन, आयुर्वेद, योग, ज्योतिष और गणित जैसी समृद्ध ज्ञान परंपराओं की संवाहक संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा है। वक्ताओं ने बल दिया कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में मानवीय मूल्यों, सदाचार, अनुशासन और विश्वबंधुत्व की भावना को विद्यार्थियों तक पहुँचाने के लिए संस्कृत शिक्षा अत्यंत आवश्यक है।
​परमपूज्य गुरुदेव श्रीश्री सच्चिदानन्द तीर्थ महास्वामी जी महाराज ने अपने आशीर्वचन में कहा कि संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे जीवन व्यवहार और संस्कारों से जोड़ा जाना चाहिए। उपस्थित शिक्षकों ने इसे एक सामाजिक एवं शैक्षणिक दायित्व के रूप में अपनाने का संकल्प लिया।
​छत्तीसगढ़ संस्कृत विद्यामण्डल के अध्यक्ष श्री राजेश कुमार राजपूत ने विद्यालयों में संस्कृत की उपयोगिता पर चर्चा करते हुए शिक्षकों को नवीन शिक्षण तकनीकों, डिजिटल संसाधनों और दैनिक जीवन में संस्कृत संभाषण को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया।
​सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ और शिक्षण की नवीन विधियाँ
कार्यक्रम के दौरान छात्राओं राधा सोनी, अंजली मानिकपुरी, सुधा कोशले, राधा जोशी, काव्या, गायत्री, सुधा पटेल एवं दीक्षा बंजारे द्वारा प्रस्तुत संस्कृत गीत ने सभी का मन मोह लिया।
​संगोष्ठी में संस्कृत शिक्षण को सरल, रुचिकर और परिणाममूलक बनाने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर विशेष रूप से मंथन हुआ।
​विद्यालयों में अध्ययन-अध्यापन की गुणवत्ता में वृद्धि करना।
​दैनिक जीवन में सरल संस्कृत वाक्यों और संभाषण का अधिक से अधिक प्रयोग।
​श्लोक, सुभाषित और नैतिक प्रसंगों के माध्यम से विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों का विकास।
​चार्ट, मॉडल और गतिविधि आधारित शिक्षण पद्धतियों का उपयोग।
​विद्यालयों में संस्कृत गीत, नाटक, प्रश्नोत्तरी एवं प्रतियोगिताओं का नियमित आयोजन।
​कार्यक्रम के अंत में ए.पी.सी. श्री प्रदीप उपाध्याय ने सभी अतिथियों, अधिकारियों और जिलेभर से आए संस्कृत व्याख्याताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। इस सफल आयोजन ने जिले में संस्कृत शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और शिक्षकों को एक साझा मंच प्रदान करने की दिशा में एक नया मील का पत्थर स्थापित किया है।

​“संस्कृतं वदतु भारतम्।
संस्कृतं जयतु भारतम्।
जयतु संस्कृतम्, जयतु भारतम्॥”

पदमराज ठाकुर

प्रधान संपादक

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