जिला क़बीरधाम,,,,,आदर्श नारीत्व का प्रतीक है वटसावित्री व्रत –गरिमा ठाकुर

गरिमा ठाकुर कवर्धा,,,, वैसे तो हिन्दू धर्म में अनेकों पर्व और त्यौहार उत्साह पूर्वक मनाये जाते हैं मगर वट सावित्री का पर्व सुहागिन महिलाओं के लिये खास महत्व रखता है। वट सावित्री व्रत हिन्दू महिलाओं के लिये सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक व्रतों में से एक है। अपने अखंड सौभाग्य और कल्याण के लिये महिलायें आज के दिन यानि ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को वट सावित्री व्रत रखती हैं। इसी दिन सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी। वट का वृक्ष त्रिमूर्ति को दर्शाता है यानि यह वृक्ष भगवान ब्रह्मा , विष्णु और महेश का प्रतीक है। इसके नीचे बैठकर पूजन करने , व्रत कथा आदि सुनने से मनोकामना पूरी होती है। भगवान बुद्ध को भी इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। अत: वट वृक्ष को ज्ञान , निर्वाण व दीर्घायु का पूरक माना गया है। यह त्यौहार देश के विभिन्न राज्यो में पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये श्रीमति गरिमा ठाकुर ने बताया कि ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या ही वट सावित्री अमावस्या कहलाती है। इस दिन शनि जयंती मनाने की भी परंपरा है। वट सावित्री व्रत को कुंवारी और विवाहित दोनों ही महिलाओं द्वारा रखा जाता है। इसमें जहां कुंवारी कन्यायें इच्छानुसार वर की कामना के लिये ये व्रत करती हैं
वट वृक्ष का महत्व
पुराणों में यह स्पष्ट लिखा गया है कि वट का वृक्ष त्रिमूर्ति को दर्शाता है। इसकी जड़ों में भगवान ब्रह्माजी , तने में विष्णुजी और पत्तों में शिवजी का वास है। इसके नीचे बैठकर पूजन करने , व्रत कथा कहने और सुनने से मनोकामना पूरी होती है। भगवान बुद्ध को भी इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। अत: वट वृक्ष को ज्ञान , निर्वाण व दीर्घायु का पूरक भी माना गया है। हिन्दू धर्म के अनुसार प्रयाग के अक्षयवट , नासिक के पंचवट , वृंदावन के वंशीवट , गया में गयावट और उज्जैन के सिद्धवट। इन पाँचों वटों को पवित्र वट की श्रेणी में रखा गया है।
वट सावित्री का महत्व
वट सावित्री की कथा हर परिस्थिति में अपने जीवनसाथी का साथ देने का संदेश देता है। इससे ज्ञात होता है कि पतिव्रता स्त्री में इतनी ताकत होती है कि वह यमराज से भी अपने पति के प्राण वापस ला सकती है। वहीं सास-ससुर की सेवा और पत्नी धर्म की सीख भी इस पर्व से मिलती है। मान्यता है कि इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु, स्वास्थ्य और उन्नति के लिये यह व्रत रखती हैं।




