कबीरधाम,,,,,18 हेक्टेयर भूमि में 32,500 सागौन पौधों का किया गया रोपण

कवर्धा, 03 फरवरी 2026। वन विकास निगम के कवर्धा परियोजना मंडल अंतर्गत बोड़ला परिक्षेत्र ने आरक्षित वन क्षेत्र को अतिक्रमण से मुक्त कर उसे पुनः हरित क्षेत्र में बदलने की दिशा में एक उल्लेखनीय कार्य किया है। आरक्षित वन कक्ष क्रमांक आरएफ/02 की लगभग 18 हेक्टेयर भूमि, जो लंबे समय से अवैध अतिक्रमण की चपेट में थी, अब सघन सागौन वृक्षारोपण के माध्यम से पुनर्जीवित हो रही है। यह भूमि न केवल शासकीय संपत्ति के दुरुपयोग का उदाहरण बन चुकी थी, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा था। आसपास के क्षेत्रों में भी अतिक्रमण का दबाव लगातार बढ़ रहा था। ऐसे में विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त कराकर पुनः वन के रूप में विकसित करना था।
उच्च अधिकारियों के निर्देशन तथा स्थानीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों की टीम भावना के परिणामस्वरूप पहले चरण में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई सफलतापूर्वक की गई। साथ ही आसपास के लोगों को सख्त संदेश दिया गया कि वन भूमि पर किसी भी प्रकार का अवैध कब्जा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और दोषियों पर कठोर कार्रवाई की जाएगी। अतिक्रमण हटाने के बाद सामने आई भूमि अत्यंत पथरीली एवं कठोर मिट्टी वाली थी, जो रोपण के लिए चुनौतीपूर्ण मानी जाती है। इसके बावजूद परिक्षेत्र के अधिकारियों और कर्मचारियों ने मृदा संरक्षण पर विशेष ध्यान देते हुए 13 हेक्टेयर नेट क्षेत्र को वृक्षारोपण के लिए तैयार किया। वर्ष 2025 में वन विकास निगम की नर्सरी में तैयार उच्च गुणवत्ता के 32,500 सागौन रूट-शूट पौधों का क्रो-बार तकनीक के माध्यम से सफल रोपण किया गया। वर्तमान में इन पौधों की अधिकतम ऊंचाई लगभग 3 फीट तथा औसत ऊंचाई लगभग 1.5 फीट है। पौधों की जीवितता प्रतिशत भी संतोषजनक पाई गई है। आज यह क्षेत्र केवल कागजों पर आरक्षित वन नहीं है, बल्कि धरातल पर एक विकसित होते सागौन वन का रूप ले रहा है।
वन प्रबंधक कवर्धा परियोजना मंडल ने बताया कि रोपित 32500 सागौन पौधों के माध्यम से भविष्य में कार्बन सिंक का निर्माण होगा। सघन वृक्षारोपण ने भूमि को पुनः अतिक्रमण से संरक्षित कर दिया है। वन विकास निगम के उद्देश्यों के अनुरूप यह सागौन वृक्षारोपण उच्च गुणवत्ता वाले इमारती काष्ठ का महत्वपूर्ण स्रोत बनेगा। उक्त क्षेत्र में रोपण से लेकर भविष्य में विरलन कार्य तक स्थानीय निवासियों को रोजगार के भी अवसर मिलेंगे। इस प्रकार के रोपण से आसपास के क्षेत्रों में भी वनों को लेकर जागरूकता बढ़ी है। इससे अन्य अतिक्रमित क्षेत्रों को मुक्त कराकर उसमें रोपण किया जाना आसान होगा।




